Saturday, November 26, 2011

अप्रैल फूल बनाया


      अप्रैल फूल बनाया
चतुर्थ मास के प्रथम दिवस को,
उल्लू     के    मन   आया |
रहे  बनाते   उल्लू     हमको,
दिवस      हमारा     आया |

मैं भी आज    स्वंय  सरीखा,
उल्लू        इन्हें    बनाऊं |
अपने    मोबा इल से  झूठे,
कुछ       मैसेज  भिजवाऊं |

भैंस वती को 'मैसेज'  भेजा,
ब्युटी  पार्लर         जाओ |
क्रीम  बनाई एक    उन्होंने,
गोरी     तुम   हो   आओ |

गधे राम को   भेजा 'मैसेज',
सुन्दर - वन   में    जाओ |
वहां   जमी  है अक्लघास जो,
चर कर      अक्ल  बढाओ |

'मैसेज  भेजा चूहे   जी को,
लोमड़  -  वैद्य     पटाओ |
सिंह - राज जो खाते  गोली,
खाकर   कैट       भगाओ |

बिल्ली   को  भेजा 'संदेसा',
'बन्दर्-मुनि' पर    जाओ |
सम्मोहन का मंत्र सीख कर ,
मोटे - रैट         पटाओ |

भेज  संदेशे   उल्लू - राजा,
मन ही मन       इतराये |
देखा सन्देशे  ,  भेजे   पर,
बिना'सैण्ड'का बटन  दबाये |



Friday, October 14, 2011

stuti


       स्तुति
               -डा.राज सक्सेना
वह सुरापात्र दो दयानिधे,
बिन मांगे पूरा भर जाए |
है आठ लार्ज कोटा अपना,
बिन मांगे पूरा कर जाए |

प्रातः उठते ही हैम चिकन,
फ्राइड फिश से हो ब्रेकफास्ट |
हो मट्न लंच में हे स्वामी,
मैं बटरचिकन से करूं लास्ट |

मिलजाय डिनर बिरयानी का,
संग चिकनसूप भरकर आए |
है आठ लार्ज कोटा अपना,
बिन मांगे पूरा कर जाए |


हो आमलेट से दिवस शुरू,
तीखे कैचप के साथ प्रभो |
फ्राईफिश,सींक कवाब मिले,
जब करूं लंच मैं महाप्रभो |

बस मुर्गतन्दूरी,मटन करी,
नित नैक्स्टडिनर लेकर आए |
है आठ लार्ज कोटा अपना,
बिन मांगे पूरा कर जाए |

कीमे से भरा पराठा भी,
मक्खन केसाथ मिले स्वामी |
हर लंचडिनर में नानवैज्-,
की तीनडिशेज कर दे स्वामी |

फ्राइड लीवर और किडनी भी,
दारू संग चखने तर आए |
है आठ लार्ज कोटा अपना,
बिन मांगे पूरा कर जाए |

हो जाय भले कैंसर फिर भी,
मैं नहीं डरूं वह शक्ति  दे |
अगड़्म्-बगड़म बस नानवैज,
दे दे मुझको मत भक्ति दे |

हो मुर्ग मुसल्ल्म अंत समय,
उदरस्थ करे और तर जाए |
अंतिम घड़ियों में आठ लार्ज ,
कवि'राज'पिये और मरजाए |
वह सुरापात्र दो दयानिधे,
बिन मांगे पूरा भर जाए |
     -धनवर्षा,खटीमा-२६२३०८

Sunday, October 2, 2011

kundali anna hazaare

गांधी जी के  देश में, उठने लगे   सवाल |
अनशन अन्ना ने किया,जलने लगे दलाल |
जलने लगे दलाल,  अजब आरोप लगाते,
अनशन पर ये  गांधी का अधिकार  बताते |
कहे'राज'कविराय, न कोई हल  बतलाता,
घोटालों पर हर दलाल,चुप क्यों हो  जाता |
         -०-
ब्लैक मनी स्कैम पर, कर लेते मुख बन्द |
मालमलीदा खा रहे, इस युग के  जयचंद |
इस युग के जयचंद,ग्राण्ट लाखों में पाते ,
कागज में कल्याण दिखा कर खुद खा जाते  |
कहे'राजकविराय',बांट कर पैसा   खाते,
जो आन्दोलन करो सभी को फ्राड बताते |
         -०-

Friday, September 30, 2011

rajnaitik dohe

      राजनैतिक दोहे
              -डा.राजसक्सेना 
आज़ादी है मुल्क में,करता रह विस्फोट |
सत्ता को लाशें नहीं,गिनने हैं कुछ वोट |

कब्रगाह में हो गया,पूर्ण नगर तब्दील |
नेता मंचों पर खड़े, देते  रहे  दलील |

हर हत्या के बाद वे, ला कठोर प्रस्ताव |
राजधर्म का कर रहे,कितना सही निभाव |

आतंकी विस्फोट का, इतना हुआ प्रभाव |
वीर बनें, धीरज धरें, देते  रहे  सुझाव |

हिंसा,हत्या,सिसकियां,आंसू और आतंक |
सब का यही भविष्य है,राजा हो या रंक |

गोली,कर्फ्यू,लाठियां  और दंगों  के दृष्य |
लोकतंत्र का हो गया,निश्चित यही भविष्य |

हिंसा,भय,आतंक से,दिवस न खाली जाय |
चाकू,फरसे,खुखरियां, बने शांति   पर्याय |

अपनी रक्षा खुद करें,  कहते नेता   लोग |
हिंसक होती जा रही,इस युग की हर नस्ल |

सौदे, साज़िश-सैकड़ों, धमकी  और मलाल |
देकर अपने देश को,  सत्ता    रहे  संभाल |

जन विकास के खेल को,देखें होकर    मौन |
अंधों को टी.वी.मिलें, बहरे   पायें    फोन |

आज़ादी के बाद से, ऐसा    हुआ   विकास |
पहले जो था पास में,     नहीं रहा वह पास |  

बौनों ने    जब से    रचा,   अपना संविधान |
सत्ता   चेरी हो      गई, चाकर हुआ  विधान |

Tuesday, August 30, 2011

राजनीति-बाज़


       राजनीति-बाज़
              -डा.राज सक्सेना
संसद में नाटक किया,लगा मुखौटा एक |
गर्म कडाही सिर पड़ी,लीं कुछ पूड़ी सेक |
ली कुछ पूड़ी सेक,रखी मनमें मनवाली,
नहीं सोचते थे , सड़कों पर खाएं गाली |
सुनो'राजकविराय,'इन्हें हम अब देखेंगे,
ये दो कौड़ी के लोग घुटालों   को रोकेंगे |
         -०-
धोखे से उंगली दबी,उसको लिया निकाल |
अब देखेंगे हम तुम्हें, अन्ना,केजरि-वाल |
अन्ना केजरि-वाल, जरा ठन्डे  हो जाओ,
हम क्या कर सकें, प्रिय अन्दाज़ लगाओ |
सुनो'राजकविराय'परिस्थिति विकट बताकर,
हम रख देंगे इसबार आपको विकट नचाकर |
         -०-
मिली जरा सी आड़ तो, तोड़ा अग्नि वेश |
धीरे-धीरे तोड़ दें, बाकी रहे    जो शेष |
बाकी रहे जो शेष,  देखना  खेल हमारा ,
इतना रगड़ें तुम्हें, नहीं लो सांस दुबारा  |
सुनो'राजकविराय',प्लान पर लगे हुए हैं,
छंटे  हुओं  में छंटे, लाम पर डटे हुए हैं |
           -०-
सुविधा भोगी साधु था,स्वामी अग्नि-वेश |
अन्ना जी की टीमसे,अब वह हुआ अशेष |
अब वह हुआ अशेष,सत्य का खड़ा युद्ध है,
जनता का हर शख्स,इसी पर बड़ा क्रुद्ध है |
कहे'राजकविराय्',लोग तो अभी साथ हैं,
डाल-डाल नेतृत्व,तो अन्ना पात्-पात हैं |
          -०-